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योग कार्यशाला

Yashendu

योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है एवं इसका अर्थ एक करना, आत्मा एवं ईश्वर का एक साथ आना हैI योग एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा आप अपने आत्म को ईश्वर के साथ विलीन कर सकते हैंI योग चिंतन की एक पद्धति है जो मानव चेतना के विकास में एक महत्वपूर्ण खोज लाती हैI इस प्रक्रिया के द्वारा एक व्यक्ति नैतिक, संगठित, एकीकृत एवं संतुलित होता हैI सर्वव्यापक दैवी शक्ति को एक ठंडी मंद हवा के रूप में महसूस या अनुभव किया जा सकता हैI सभी धर्मग्रंथों का मुख्य विषय है "आपके स्वयं को जानें" - यह स्पष्ट हो जाता है एवं कोई अपने आपके विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता हैI

योग केवल भौतिक शरीर के लिये नहीं है, लोग कई कारणों से और अधिक जुड़ा महसूस करने, मन को शान्त करने एवं शरीर को मजबूत करने के लिये योग का अभ्यास करते हैंI यह मन-शरीर का अभ्यास है जो दुरूस्ती के साथ आध्यात्मिक कल्याण को बढ़ाता हैI योगी समझते हैं कि मन एवं शरीर एक हैं एवं यदि इसे  सही उपकरण प्रदान किया जाता है एवं सही पर्यावरण में ले जाया जाता है, यह एक ताल प्रप्त कर सकता है एवं अपने आपका उपचार कर सकता हैI इसलिये योग को उपचारात्मक समझा जाता हैI यह आपको अपने शरीर की मुद्रा, समरेखन एवं गति के स्वरूप के प्रति अधिक जानकार होने में मदद करता हैI जैसा विश्व भर में लोग योग के लाभों को जानते हैं, यह शरीर को और अधिक लचीला बनाता है एवं एक तनावग्रस्त पर्यावरण के बीच भी तनाव कम करने में मदद करता हैI यह प्रमुख कारणों में से एक है कि क्यों लोग बेहतर महसूस करने, अधिक ओजस्वी बनने, अधिक प्रसन्न होने एवं शान्त रहने के लिये योग का अभ्यास शुरू करना चाहते हैंI

योग का मुख्य उद्देश्य जिसे हम प्राप्त करना चाह रहे हैं वह हमारी आत्मा को परम चेतना, जो कि "हमारे ईश्वर" हैं, के साथ मिलाना हैI इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिये हमारी शारीरिक एवं मानसिक तंदुरूस्ती आवश्यक हैI योग अच्छे स्वास्थ्य एवं रोग एवं बीमारी के रोकथाम पर जोड़ देता हैI योग व्यस्ततापूर्ण जीवनशैली के द्वारा उत्पन्न रोग एवं तनावों से चंगा होने एवं उन पर काबू पाने के लिये एक चिकित्सा के रूप में प्रयुक्त होता हैI हमारे शरीर एवं मन तनाव, चिन्ता एवं उदासी को प्रतिबिंबित करते हैं जिनके अधीन हम प्रतिदिन रहते हैंI

यशेन्दु गोस्वामी ने किसी के द्वारा विभिन्न शारीरिक एवं मानसिक विषयों से बुरी तरह प्रभावित विषयों को हल करने के लिये  योग कार्यशालाओं की रूपरेखा तैयार की हैI हम जिन कार्यशालाओं को चलाते हैं वे निम्नांकित हैं:

shoulderstand

वजन कमी के लिये योग कार्यशाला
पीठ के दर्द के लिये योग कार्यशाला
यौन ऊर्जा को संतुलित करने के लिये योग कार्यशाला
श्वसन तन्त्र के लिये योग कार्यशाला
तनाव के लिये के लिये योग कार्यशाला
मानसिक स्वास्थ्य के लिये योग कार्यशाला
पाचन तन्त्र के लिये योग कार्यशाला
महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं के लिये योग कार्यशाला
आँख, गर्दन एवं कंधे के लिये योग कार्यशाला

नौसिखिया, मध्यवर्ती एवं विकसित योग का समावेश करते हुये, कार्यशाला व्यक्ति की अपनी योग्यता स्तर को पूरा करने के अनुकूल बनाया जा सकता हैI हम योग शिक्षकों के लिये भी योग कार्यशाला प्रदान करते हैंI हम योग की प्राचीन परिकल्पनाओं एवं सिद्धांतों का आदर करते हुये योग को इसके प्राचीन एवं मूल रूप में अभ्यास करते हैंI

प्राणायाम - एक लघु परिचय

प्राणायाम पद प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत से लिया गया एक शब्द हैI यह हमारी श्वसन क्रियाओं के विनियमन एवं हमारी जीवनदायी शक्ति के नियन्त्रण को सूचित करता हैI हम सभी जानते हैं कि हम एक मिनट से अधिक समय तक साँस के बिना नहीं रह सकते हैं, तब भी अनेक लोग या तो अच्छी तरह से साँस नहीं लेते हैं या इस बात से अनभिज्ञ हैं कि ठीक से साँस लेने का मतलब क्या हैI साँस की बदबू की आदत के साथ एक व्यक्ति अपने शरीर की संभाव्य जीवनदायी शक्ति के एक अंश का ही सदुपयोग करता हैI

प्राण एक ऊर्जा या एक प्रकार की जीवनदायी शक्ति है जिसका अनुभव हम प्रकृति में कर सकते हैं: उदाहरण के लिये पवन एक ऊर्जा है जिसे हम नहीं देखते हैं, फिर भी हम पेड़ों या घास आदि के कारण जानते हैं कि इसका अस्तित्व हैI उसी प्रकार से प्राण भी अदृश्य है लेकिन हम फिर भी इसे महसूस करते हैं, उदाहरण के लिये जब हम अपनी नाक के सामने अंगुलियों को रखते हैं तो अपने साँस महसूस करते हैंI इसलिये हमारी साँस प्राण का एक बाह्य प्रत्यक्षीकरण हैI जब हम अपनी साँस को नियंत्रित करना सीख जाते हैं, तब हम अपने शरीर में सूक्ष्म ऊर्जाओं का विनियमन करते हैं एवं अपने मन को भी नियंत्रित करते हैंI

योग में साँस के विभिन्न व्यायाम हैं जो हमारे शरीर में प्राण के प्रवाह को अनुलूलित करते हैंI हमारे विभिन्न शारीरिक कार्यों को विनियमित करने के लिये हमारे शरीर में पाँच विभिन्न प्रकार के प्राण हैं: प्राण, अपान, व्यान, उदान, समानI

प्राणायाम व्यायाम के तीन विभिन्न रूप हैं: पूरक, कुम्भक एवं रेचकI पूरक अंत:श्वसन, कुम्भक साँस को रोक कर रखना एवं रेचक उच्छावास हैI

 

 

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