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मौन रहना एक स्वास्थ्यकर जीवन, अंतिम मुक्ति एवं आनन्द की प्राप्ति के लिये खुलनेवाले दरवाजे की कुंजी है। यह हमारे दृष्टि, हमारे विचार, हमारे सोचने के ढ़ंग, भावना एवं संसार में हमारे कार्य करने के तरीकों का उत्थान करता है। शान्ति ही वह माध्यम है जो हमें पूर्णत:यह जानने एवं अनुभव करने में मदद करता है कि हम क्या हैं और जीवन में हमारा उद्देश्य क्या है? मौन रहना शरीर, मन एवं आत्मा से पूर्ण मुक्ति का रास्ता सुझाता है। मौन रहने के लिये प्रशंसा आसक्त विचारों एवं क्रियाकलापों की आवश्यकता का स्थान लेती है। जब हम शान्ति से प्रेम करते हैं तो हमें अपने विचारों एवं भय से भागने का कोई कारण नहीं है। मौन का अभ्यास अवर्णनीय शान्ति लाता है।
भाषा हमारी ऊर्जा की सबसे बड़ी उपभोक्ता है, यह हमारे शरीर एवं मन में ऑक्सीजन का उपभोग करती है और ऊर्जा का क्षय करती है।
बदले में यह मस्तिष्क को अत्यधिक गर्म करती है जो हमें
क्रोधित, अधीर आदि करता है और इसलिये
हम शान्तिपूर्वक, ठंढ़ेपन के साथ या तर्कपूर्वक सोच या
कार्य नहीं कर सकते हैं।
स्वामीजी अपनी कार्यशालाओं एवं संगोष्ठिओं में मौन रहने का अभ्यास करने की सलाह देते हैं। केवल इस मौन चिकित्सा में भाग लेकर आप इसके लाभों एवं इससे प्राप्त होनेवाले ऊर्जा की मात्रा को समझ सकते हैं।
बिना भाषा के प्रयोग के एक दूसरे से विचारों के आदान-प्रदान करने के कई तरीके हो सकते हैं, स्वामीजी मानते हैं कि जब दो लोग आपस में मिलते हैं तो ऊर्जावान ढ़ंग से संवाद करना संभव है क्योंकि संवाद केवल भाषा के द्वारा ही नहीं किया जाता है बल्कि ऊर्जा स्तरों में तालमेल रख कर ही आप संवाद कर सकते हैं। स्वामीजी ज्यादा काम ऊर्जा के साथ करते हैं और मानते हैं कि हम अपनी ऊर्जा में भाषा के माध्यम की अपेक्षा शांति में अधिक तालमेल रख सकते हैं।
लेकिन वे यह भी महसूस करते हैं कि हम भाषा के अतिरिक्त संवाद करने की अन्य विधियों को क्यों नहीं विकसित कर सकते हैं चूँकि वे मानते हैं कि हम भाषा के माध्यम से जो कुछ भी व्यक्त करने की कोशिश करते हैं तो हम इसके अधिकांश सार तत्वों को खो देते हैं।
शब्द हमारी मूल भावना का कभी भी केवल एक सीमित व्याख्या कर
सकता है, शब्द कभी भी अहसासों एवं भावना के आवेशों के सही
मनोभावों को नहीं समझ सकता।
स्वामीजी मानते हैं कि चिकित्सा ऊर्जा मौन में अधिक मुक्त
रूप से विचरण करती है।
स्वामीजी बहुत ही कम उम्र से मौन का अभ्यास करते आ रहे हैं।
चौदह वर्ष की उम्र में उन्होंने तीन महीने जंगल में
अकेले रहकर बिताया। साढे
तीन वर्ष तक गुफा में मौन के अभ्यास के लिए 1997 में गुफा
में प्रवेश करने के पूर्व एवं पश्चात् स्वामीजी ने कई
दूसरी अवधियाँ, तीन या छ: महीने से एक साल तक, मौन में रह
कर बिताईI मौन में रह कर समय बिताना स्वामीजी के लिए इस
दुनियाँ में जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण एवं आवश्यक
दोनों है।
स्वामीजी व्यक्तिगत रूप से मौन रहने की उनकी प्रकृति
एवं इसकी आवश्यकता को लोगों को बतलाना चाहते है।
अपने कार्य के क्रम में भ्रमण के समय या आश्रम में अपने
आवास में वे लोगों को उन्हें गले लगाने के लिए या समय-समय
पर मौन में रहकर उनके साथ बैठने के लिए प्रोत्साहित करते
हैं। स्वामीजी लोगों को यह भी
बतलाना चाहते हैं कि यदि वे उनसे बात करना चाहते हैं एवं
उन्हें अपनी समस्याएँ बतलाना चाहते हैं तो वे अत्यधिक
सुगम्य एवं सुलभ हैं तथा वे उनकी बातों को सुनेंगे और उसका
निदान करने की कोशिश करेंगे।
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