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स्वामी बालेन्दु जी के साथ प्रथम भेंट

Swami Ji's personal diary
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Michael Kosak, Swami Balendu and Yashendu

स्वामी बालेन्दु के साथ मेरी प्रथम भेंट ............ - डॉ. माइकेल कोसाक

 

प्राक्कथन

मई 2001 में स्वामीजी के साथ भेंट मेरे लिये एक बहुत बड़े सम्मान की बात थी I हमारे परिवारों के बीच जो मित्रता कायम है वह प्रेम का है और हम सब के लिये अमुल्य है I

इस विषय पर मैं यह समझाना चाहता हूँ कि 27 मई 2001 को मैलोर्का के लिये एक उड़ान के दौरान जब मैं स्वामीजी से मिला तो परिस्थितियाँ ऐसी अनोखी थी कि मैंने परवर्ती तारीख को हमारे  प्रगतियों एवं अनुभवों के संबंध में एक पुस्तक समर्पित करने का निश्चय किया है I

यह मेरे प्रथम संपर्क की कहानी या समय-रेखा है:

 कहानी की सच्ची पृष्टभूमि को समझने के लिये किसी को यह विचार करना चाहिये कि हमारी प्रथम भेंट 24 दिसंबर, 2000 को हुई; केवल मुझे यह पता नहीं था कि यह भेंट हुई थी I 24 दिसंबर, 2000 को मेरे एक बहुत अच्छे मित्र बरनड डाइट्रिक्स, जिनके साथ मैंने वर्षों पहले काम किया था, द्वारा भेजा गया एक अप्रत्याशित क्रिसमस कार्ड मिला I कार्ड में दो देवताओं को बाँह में बाँह डाले दिखाया गया जिसे मैंने नहीं पहचाना I उस समय मैं भारत में बहुत विस्तृत रूप से भ्रमण कर चुका था लेकिन अबतक भारतीय धर्म का कोई गहरा ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ था I मैंने कार्ड को रख लिया एवं इसपर सरसरी नजर डलने लगा I

----समय बीतता गया-----

मई 2001 को मेरी पत्नि ऐन्ड्रिया मित्रों के साथ मैलोर्का भ्रमण करने गयी थी I योजना यह थी कि मैं सप्ताह के अपने काम को समाप्त करूँ एवं अपने पुत्र रैवेल के साथ उनका अनुसरण करूँ I

मैं सैर की प्रतीक्षा करने लगा और सुखद आशा से परिपूर्ण था I मैं निश्चिंत था एवं नये अनुभवों के लिये बहुत उदार था I तदनुसार मैंने सैर के लिये सफेद जीन्स और एक चमकीले नारंगी रंग की कमीज पहनी I जीवन बहुत अच्छा था I

हैम्बर्ग हवाई अड्‌डे के टर्मिनल 4 पर आगमन की सूचना दर्ज कराने के बाद रैवेल एवं मैं हमारे हाथ में समय रहने के कारण नीचे बैठ गया तथा हवाई अड्‌डे पर होनेवाली गतिविधियों का अवलोकन करने लगा I

यत्रियों की भीड़ में मैंने एक युवक को भव्य सफेद पोशाक में देखा जिसके लंबे काले बाल थे एवं दाढ़ियाँ थीं I उस व्यक्ति के चलने का ढ़ंग अलग था और वह भीड़ के बीच से हल्के से ठाठ से जा रहा था I उसकी निश्चलता ने मुझे वश में किया और मुझे ध्यान का स्मरण कराया I मैंने रैवेल को बताया: " देखो, एक सच्चा राजा जा रहा है"I

हम उस आकर्षक राजा की आँखों से ओझल हो गये एवं हमें कुछ खरीददारी करने का मौका मिला मैंने अपनी पत्नि के लिये सुगन्धि एवं अपने लिये एक नया इत्र खरीदा I मेरी मनोदशा इतनी अच्छी थी कि मैंने शैम्पेन की दो बोतलें भी झपट लीं I

सवार होने के बुलावा की प्रतीक्षा करने के समय हम बैठ गये एवं विमानपट्‌टी पर वायुयान के जमीन पर उतरने तथा उड़ान भरने की क्रिया देखते रहे I अपने अंदर मैंने एक आंतरिक शांति महसूस किया, मैंने चारों तरफ निगाहें डाली और मेरी निगाह आकर्षण से परिपूर्ण उस कुलीन जन पर पड़ी I मैं गहरे रूप से मंत्रमुग्ध हुआ I

मैं खुश था कि वे भी मैलोर्का भ्रमण करनेवाले मालूम पड़ते थे I वे भारतीय थे यह स्पष्ट था I

रैवेल की उम्र उस समय पाँच वर्ष थी और इसलिये मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि उड़ान भरते ही वह शीघ्र सो जायेगा I इससे मुझे उड़ान के दौरान दो घंटे का आधा से अधिक बेहतर समय भारत के उस दिलचस्प व्यक्ति के साथ संपर्क बनाने के लिये मिलेगा I

उड़ान केवल आधा पूर्ण होने का मतलब था कि मैं रैवेल के साथ गलियारेवाली जगह का सहभागी था I उस अपरिचित व्यक्ति ने वायुयान के पिछले अर्द्ध भाग में सामने की तरफ कुछ कतार आगे अपना स्थान ग्रहण किया I 

मैंने अपने आपको धैर्य रखने के लिये कहा और मैं उस अवसर की प्रतीक्षा करने लगा जब वह या मैं बाद में जायेंगे I

जैसी शंका थी, रैवेल मिनटों में ही गहरी निद्रा में सो गया I उस व्यक्ति के द्वारा प्रथम चाल चलने के लिये प्रतीक्षा करने का मेरा दूसरा अनुमान तब निश्चित हुआ जब वह शौच-घर जाने के लिये खड़ा हुआ I मेरा अवसर उसके लौटने पर होता I

जब वह कुछ मिनटों के बाद मेरी जगह के पास पहूँचा तो मैंने उसका इन शब्दों के साथ अभिवादन किया: "हैलो स्वामी!"

सहज-ज्ञान से मैंने सोचा कि मेरा सन्निकर्ष अधिक सीधे स्वर में था, तथापि, वे सज्जन रूक गये, मुड़े एवं मुझे देखकर मुस्कराने लगे I

मेरा प्रश्न था: "आपको कहाँ जाना है?" उन्होंने उत्तर दिया: " मैं मैलोर्का की यात्रा कर रहा हूँ" I

इस पर मैंने तुरंत अपने आपसे कहा:"कितना बेवकूफी भरा प्रश्न है, क्योंकि हम एक ही विमान में हैं जो कि पहले से ही पाल्मा जाने के रास्ते में है!"

मैंने पूछा: "आप मैलोर्का में क्या करते हैं?"

उन्होंने कहा: "मैं धर्मोपदेश दे रहा हूँ एवं ध्यान कर रहा हूँ" I

कुछ कारणों से सत्तर के दशक के हिट धुन एवं चलचित्र: "प्रीचर मैन (धर्मोपदेशक व्यक्ति) दिमाग में आ गये I "आश्चर्यजनक"! मैंने उत्तर दिया एवं अपनी कतार में उसे रास्ता दिया I "मैं भी ध्यान करता हूँ" और मैं कभी उसके साथ ध्यान करने का स्वप्न देखने लगा I

मेरा अगला प्रश्न था, "आप द्वीप पर कहाँ रूके हुये हैं?

उन्होंने जवाब दिया, "मैं नहीं जानता", मेरे पास केवल एक फोन नंबर है I

"वाह", यह आश्चर्य की एक सहज प्रतिक्रिया थी कि मैं यात्रा के एक सच्चे उमंगी व्यक्ति से मिला जिसे पता नहीं था कि उसके साथ क्या होने जा रहा था

उसने मुझे बताया कि वह वृंदावन, जो कि आगरा से अधिक दूर नहीं है, का रहनेवाला था I

मैंने वृंदावन के बारे में पहले कभी नहीं सुना था एवं मैं इस बात से बहुत दु:खी हुआ कि मैं भारत अनेक बार गया था और मुझे इस पावन भूमि का न तो कोई अनुभव हुआ और न ही इसके बारे में कभी सुना I यह जानकर कि यह आगरा एवं ताजमहल के निकट है मुझे थोड़ी सी शांति मिली एवं इससे मुझे दिग्विन्यास का एक सामान्य विचार हुआ I

अंत में मैंने उनका नाम पूछा I

उनका उत्तर था "गोस्वामी बालेन्दु" I
उन्होंने इतनी मृदुलता से कहा मानो यह एक सुन्दर मधुर गीत हो I
वास्तव में मैंने गलती से उन्हें कहते सुना "स्वामी" और यह सोचा कि कोई ओसो सन्यासीन मेरे बगल में बैठा है I
स्वयं सन्यासीन होने के कारण मैं और अधिक उत्तेजित हो गया I

वास्तव में मैंने गलत सुना था और यथायोग्य उनसे पूछा कि उनके नाम का अर्थ क्या है: उन्होंने उत्तर दिया, "बालेन्दु का अर्थ है: छोटा चाँद" I

मुझे प्यार हो गया था......जैसे दिल पर तीर चुभ गया हो!

छोटा चाँद, छोटा चाँद, मैंने बार-बार अपने आप दुहराया I मुझे प्यार हो गया था !

क्योंकि रैवेल जाग गया था यह स्पष्ट था कि हम पाल्मा के निकट पहुँचनेवाले थे I बालेन्दु ने मुझे अपना फोन नंबर दिया और मैंने फोन करने का वादा किया I

मैंने अपने आपसे कहा, "सफर की कितनी शानदार शुरूआत हुई!"

तीस मिनटों के बाद सामानों एवं रैवेल को हाथ में पकड़कर हम सुरक्षाकक्ष से गुजरे एवं हमने ऐन्ड्रिया को हमारी उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते रहने की आशा की
कार पार्क जाने के रास्ते में मैं ऐन्ड्रिया को बालेन्दु के बारे में बताना चाहता था जब उसने यह सूचित किया कि उसने एक दिलचस्प भारतीय व्यक्ति को टर्मिनल छोड़ते देखा था और उसने यह अनुमान किया कि मैं उसके संपर्क में था I

वह तुम्हारा नारी सुलभ अंतर्बोध!!

सोमवार को पूरे सुबह मैं यह आश्चर्य कर रहा था कि गोस्वामी संभवत: कहाँ ठहर सकते थे? यह स्पष्ट था कि उनके पास कोई सुराग नहीं था कि वे कहाँ टिके हुए थे एवं उनके पास उनके (स्वामीजी) द्वारा दिया गया केवल फोन नंबर था I यद्यपि यह विचित्र था तथापि उनके लिये यह यथेष्ट मालूम पड़ता था I

मेरी मनोदशा बहुत अच्छी थी और मैं उनको उस अपराह्न फोन करने की प्रतीक्षा करने लगा I

हमेशा की तरह हमने प्लाजा डि पाल्मा के निकट एक फ्लैट थोड़े समय के लिये भाड़े पर लिया था I वहाँ से शहर पहुँचना आसान था I

उस अपराह्न मैंने बालेन्दु को फोन किया एवं फोन पर एक दूसरा अपरिचित भारतीय आवाज सुनाई दी I मैंने बालेन्दु के बारे में पूछा I

"कृपया एक मिनट ठहरें"

"हाँ, हलो"? एक मधुर आवाज सुनाई दी I

मैंने पूछा, "बालेन्दु, आप कहाँ हैं"?

उन्होंने किसी से हिन्दी में पूछा एवं उत्तर दिया "शिनकेंस्ट्रेब"I

उस अनोखे पते को सुनकर मुझे हँसी आ गयी I एक धार्मिक गुरू बदनाम बैलरमैन के बीच I हास्यास्पद!!
"आप कहाँ हैं"? मैंने अविश्वास से पूछा I

"शिनकेंस्ट्रेब"!
उन्होंने मुस्कराते हुये कहा "आप 6 बजे दर्शन के लिये आ सकते हैं" I

मैंने पुष्टि किया और ज्योंही मैंने फोन नीचे रखा मेरा पूरा शरीर पूर्वानुमान से रोमांचित हो उठा I
मेरी प्रथम भेंट अकेले होगी एवं मैं इसके अनुभव को ऐन्ड्रिया को बताऊँगा I

मैलोर्का के आकार को ध्यान में रखते हुये हमअलोगों का बैलरमैन से केवल 10 मिनट की डूरी पर होना एक बहुत बड़ा संयोग था I सचमुच अविश्वसनीय I

छ: बजे के ठीक पहले मैं "शिनकेंस्ट्रेब" के लिये विदा हुआ और कमोवेश सड़क पर नाच रहा था, प्रत्याशा से भरा हुआ, छोटी सड़कों एवं विशाल फिंका उद्यान से होता हुआ गुजर रहा था I परछाईयों के रहस्य एवं संध्या के प्रकाश ने मिलकर मेरे अंदर एक महानता की भावना उत्पन्न की; मैं जीवित था!

शिनकेंस्ट्रेब के अंत में एक चारमंजिला इमारत में प्रवेश करने के पूर्व मैं रूक गया एवं अपने आप को तैयार करने के लिये कुछ समय लिया I क्षेत्र एवं सड़क के स्वरूप का अवलोकन करते समय इसने मुझे अचानक पूर्णतया दंग, शांत भी कर दिया I मैं सड़क पर नीचे समुद्र की तरफ देख रहा था I सड़क के दूसरी ओर कुछ मोटरगाड़ियों ने पत्थर के एक तोरणपथ से होकर प्रवेश किया I

मैंने घंटी बजायी I
प्रवेश द्वार खुला था, साथ ही चौंथी मंजिल पर फ्लैट का दरवाजा भी I
दो जोड़ी भारतीय आँखों ने मेरा अभिवादन किया I

"मेरा नाम डॉ. कोसैक है", मैं यहाँ स्वामी बालेन्दु से मिलने के लिये आया हूँ I

दो महिलाएँ मुझे रहने के स्थान पर ले गयीं जो अंगीठी के पास रखी एक छोटी मेज एवं एक सोफे के सिवाय पूर्णतया खाली था I
दृश्य भव्य था एवं साफ-साफ दिखाई देता था I
"मैं इसे जानता था; आप यहाँ से भूमध्यसागर देख सकते हैं!" मैंने स्वत: कहा I

एक महिला ने मुझे धैर्य रखने एवं नीचे बैठने के लिये कहा I यह भी पूछा कि क्या मुझे पीने के लिये कुछ या फल चाहिये? मैंने कुछ मूँगफली लिये एवं फर्श पर पलथी मारकर बैठ गया I

यथासमय दरवाजे की घंटी बजी एवं सड़ी में और दो भारतीय महिलाओं ने कमरे में प्रवेश किया I वे मेरे बगल में नीचे बैठ गयीं I
अगले बीस मिनटों में और अधिक भारतीय महिलायें आयीं जब तक हम लगभग पन्द्रह लोग एक अर्द्ध वृत्ताकार परिधि में बैठे थे I एक मात्र पुरूष के रूप में वहाँ मेरी  उपस्थिति की हकीकत ने मुझे क्षण का असाधारण रूप से मजा दिलवाया I

यथासमय बालेन्दु ने कमरे में प्रवेश किया I वे मुस्करा रहे थे, संकेन्द्रित एवं शांत थे I हमारी नजरें मिलने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई I वे सोफा पर बैठ गये एवं वे शांतिपूर्वक धीरे-धीरे बोल रहे थे I मैंने सभी उपस्थित व्यक्तियों के लिये एक प्रार्थना का अनुमान लगाया I कोई बातचीत नहीं कर रहा था एवं एक ऊर्जायुक्त चुप्पी कायम थी I

बालेन्दु ने हिन्दी में गीत शुरू किया I क्षेत्र से फ्लैट में आनेवाली आवाज का कोई प्रभाव नहीं पड़ा एवं उनकी आवाज धीरे-धीरे शांत होती गयी I

अवश्य ही वे जो कुछ भी बोल रहे थे मैं एक भी शब्द नहीं समझ रहा था I मैंने उनकी आँखों में जो ऊर्जा, तीव्रता एवं आकृति देखी मैं उससे बहुत अवगत था I जब मैं पूना में था तो उस समय ओसो की उपस्थिति में मुझे ऐसा कुछ अनुभव हुआ था I

मैं सोचना है कि दर्शन लगभग एक घंटे तक चला I मुझे पुन: एक बार जो आरामदेह अवस्था मिला था उसने समय को नगण्य कर दिया एवं मुझे इसका कुछ भी अंदाजा नहीं था कि उस समय़ कितने बजे थे I मैं सिर्फ एक बात जानता था; मैं खुश था!

जब दर्शन समाप्त हो गया प्रत्येक प्रतिभागी ने बालेन्दु के लिये कुछ उपहार छोड़े एवं उन्होंने भवन छोड़नेवाले प्रत्येक व्यक्ति को आशीर्वाद दिया I

अपने अनुभव को शांत होने देने के लिये मैंने कुछ समय लिया और मैं बालेन्दु के बगल में सोफा पर बैठ गया I हमने एक-दूसरे की तरफ गहराई से देखा I

मेरी दृष्टि वापस कमरे में लौट आयी और मैं आश्चर्य कर रहा था I मैंने छोटे मेज पर चाँदी के फ्रेम में जड़ी एक तस्वीर देखी I पता नहीं क्यों उस तस्वीर ने मेरे दिल को छू लिया और मुझे पूछना पड़ा " वह कौन है?"

यह एक बच्चे की तस्वीर थी और इस प्रकार इतनी अविश्वसनीय रूप से सुन्दर थी की मुझे उसका वर्णन करने में कठिनाई हुई I मुझे इसका निश्चित नहीं था कि क्य इसने मुझे किसी व्यक्ति या किसी वस्तु का स्मरण कराया?

बालेन्दु ने कहा , "वे मेरे प्रभु हैं" I

मेरे मुख से स्पष्ट रूप से सिर्फ एक "वाह" निकली!" और मैं उठा एवं मैंने अलविदा कहा I

उन्होंने जोर से कहा "आप वापस आ सकते हैं"!

मैंने उन्हें प्रत्येक के लिये धन्यवाद दिया एवं यह कहते हुये विदा हुआ "मेरे पास अपका नम्बर है"I

मेरे घर वापस जाने के रास्ते में पाल्मा की खाड़ी में समुद्र-तट के किनारे ट्रामुन्टाना पर्वत श्रेणी पश्चिम की तरफ धूप में नारंगी रंग में विशिष्ट रूप से प्रकाशमान थी Iरात्रि भोजन के समय मैंने अपना अनुभव ऐन्ड्रिया एवं रैवेल को बताया I

अगले दिन मैंने उन पुराने मित्रों को फोन किया जो मैलोर्का में नब्बे के अर्द्ध दशकों से रह रहे थे और न ही अहिक दूर थे I हर सैर के दौरान हमलोगों के पास रात्रि भोजन एवं प्रीतिभोज एक साथ करने का एक बहाना होता है I ज्योंही मैंने अपनी कहानी बतायी वे भी बालेन्दु से मिलने के लिये उत्सुक हो गये I

उस मंगलवार की दोपहर को मैंने बालेन्दु को पुन: फोन किया I

बालेन्दु ने कहा "अवश्य, आप सभी आ सकते हैं"!

’’आपको धन्यवाद, हम अवश्य आयेंगे"! और मेरे चेहरे पर एक बड़ी मुस्कुराहट छा गयी I

ठीक वक्त पर 11 बजे हम सभी उस बदनाम शिनकेंस्ट्रेब में इकट्‌ठे हो गये I
मैं इस पूर्वाग्रह को तर्क्संगत नहीं पाता हूँ I

रेजिना एवं रेनर के साथ उनके दो पुत्र थे I ऐन्ड्रिया एवं रैवेल मेरे साथ गये I
सूरज शानदार ढ़ंग से चमक रहा था और यह हमें बिगाड़ कर सड़ा रहा था!
सात तीर्थयात्रियों ने भवन में प्रवेश किया, फ़्लैट में पहुँचे एवं बालेन्दु के द्वारा उनका एक एक करके स्वागत किया गया जिन्होंने सामने के उसी खाली कमरे में समान स्थिति में प्रवेश किया I मुझे इसका पहले अनुभव हो चुका था I

एक जैसे संस्कारों के बाद एक लंबी परिचर्चा शुरू हुई जहाँ कोई भी व्यक्ति अपने मन की बातों को व्यक्त कर सकता था  I

कुछ समय के बाद बालेन्दु ने पूछा कि क्या हम उनके बारे में भारत में बनी फ़िल्म देखना चाहते हैं?
हमने उत्तेजनापूर्वक उत्तर दिया " अवश्य ही!"

फ़िल्म के प्रथम भाग में 10 सितंबर,1997 को वृंदावन का एक दृश्य दिखाया गया जब बालेन्दु ने गुफ़ा में प्रवेश किया; उस अवसर के लिये उनके सिर मुड़े हुये थे I मैंने अनुमान किया कि वे उस समय 25 वर्ष के थे एवं आश्चर्य किया कि उनके जैसे एक युवक को क्या संभवत: कुछ वर्षों के लिये दुनिया छोड़ देने के लिये प्रेरित कर सकता था? वह दृश्य शुरू में गुफ़ा में प्रवेश करने के ठीक ठीक तीन वर्ष एवं चार महीने बाद गुफ़ा की दीवार के टूटने एवं वास्तविक दुनिया में लौटने से संबंधित था I
 मुझे आश्चर्य हुआ कि कैसे एक मानव इस प्रकार के अद्भुत कर्म को सहन कर सकता था I  हम तस्वीरों से बहुत अधिक द्रवित हुये जिसने हमारे अंदर सिर्फ़ और अधिक प्रश्न उत्पन्न किये I कुछ का मैं केवल आकलन कर सकता हूँ कि इसे हजम करने में कई सप्ताह, महीने, साल भी लग सकते हैं I

बालेन्दु ने कहा कि अगले अपराह्न वे लंदन की यात्रा करेंगे I
हमने उन्हें हवाई अड्‌डे पर विदा करने एवं विदा का प्रणाम कहने के लिये समय निश्चित किया I

 घड़ी के दोलन के जैसे सात तीर्थयात्री अगले दिन सही समय पर मौजूद थे I

हैम्बर्ग हवाई अड्‌डे पर मेरे पूर्व के अनुभव के समान मुझे उनकी उपस्थिति से मेरे अंदर उत्पन्न प्रशांति का बोध हुआ I मेरे परिवेश एवं परिस्थिति के प्रति एक उन्नत क्षण में मुझमें जागृत शांति एवं स्थिरता की गहराई ने मेरे प्रतिदिन की मन:स्थिति को दूसरे प्रकार से अनुभव नहीं किया I

हमारे विदाई के प्रणाम एवं मेरे आँख के कोने में दु:खद आँसू के साथ हमने अपने पाक पुरूष को विदा किया I
 जब वे मुड़े तो उनके अंतिम शब्द थे " आप मुझने मिलने भारत आ सकते हैं!" और मैंने स्वत: प्रस्ताव किये " आप हमसे मिलने जर्मनी आ सकते हैं" Iइसके साथ वे दरवाजे से होकर चले गये I

आगामी दिन आराम एवं मित्रों के साथ कुछ "रस्मों", जिसमें "वियूव" बोतलों को खोलना शामिल था, के साथ बीत गये I यथासमय हम जर्मनी के नियमित जीवन में लौट गये I

हमारे घर आने के कुछ समय बाद क्रिसमस 2000  की पूर्व संध्या पर प्राप्त क्रिसमस पोस्ट कार्ड मेरे हाथों में पड़ा I इस बार मैंने इसके चारों ओर एक अधिक करीबी निगाह डाली I

कार्ड के ऊपर देवता जैसा एक चेहरा बिल्कुल उसी प्रकार का था जैसा बालेन्दु के पासवाले तस्वीर पर दर्शाया हुआ चेहरा था I केवल यह चेहरा अत्यधिक पुराना था I पॄष्ठ भाग में श्री राम नामक शब्द अंकित था I

मुझे निश्चित था कि बालेन्दु ने मुझे ऐसा ही नाम बताया था I इसके अतिरिक्त: " बालेन्दु ने कब गुफ़ा छोड़ी थी"?

"यह क्रिसमस 2000  की पूर्व संध्या थी" मैंने स्वत: कहा; इस बॊध ने मुझे एक टन ईंट के जैसा वार किया I
 संभावना, संयोग एवं जो कुछ भी घटा था उसकी अविश्वसनीयता जबर्दस्त थी I पर्याप्त रूप से संभावना को अलग करने एवं नकारने की मेरी प्रतिदिन की अभिज्ञता स्पष्ट थी!

 नवंबर 2001 को एक दिन मैंने अपने घर पर एक फोन का उत्तर दिया और मेरे द्वारा पहले सुनी गयी एक सुस्पष्ट आवाज सुनाई दी !
 "प्रश्न था " क्य मैं ल्युनवर्ग आ सकता हूँ"?

 "अवश्य ही, बालेन्दु"! यह मेरा फ़ौरन उत्तर था एवं मैं उनसे द्वितीय बार मिलने की प्रतीक्षा करने लगा I

 

 

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